कहानी :- किसान और देवताओ के राजा इन्द्र के ऐरावत हाथी की



मध्य भारत के एक गांंव का किसान जो बहुत गरीब था अन्य किसानो के मुकाबले उसकी दशा भी ख़राब थी। परन्तु एक वर्ष बारिश अच्छी नहीं हुई और पुरे गांंव की फसलें कमजोर हुई पर उस गरीब किसान की फसल बाकी किसानो के मुकाबले अच्छी हुई। इससे वो बहुत खुश था और अपनी फसलों की खूब देख भाल करता और बहुत मेहनत करता।





एक रात देवताओ के राजा इन्द्र का ऐरावत नाम का हाथी उड़ाता हुआ उस गाँव के ऊपर से जा रहा था तभी उसकी नज़र उस गरीब किसान के हरे भरे धान के खेत पर पड़ी और वह अपने पर नियंत्रण नहीं कर पाया और वो उस खेत में जाकर फसल का 1/4 हिस्सा खा गया। अगले दिन जब किसान खेत में आया और अपना 1/4 उजड़ा खेत देख कर दुखी और नाराज हुआ पर वो चुप रहा क्योकि उसको अपराधी के बारे में मालूम नहीं था




दूसरी रात को भी फिर वही प्रक्रिया दोहराई गयी ऐरावत आया फिर उसी गरीब किसान के हरे भरे धान के खेत का 1/4 हिस्सा खा गया अब की बार किसान का धैर्य खो दिया और रोता हुआ घर आया। अपनी पत्नी को सारी बात बताई कैसे कोई उसका आधी फसल नष्ट कर चूका है गरीब किसान की पत्नी ने उसको एक उपाय बताया की वो रात में जाकर देखे कौन उसका नुक़सान कर रहा है


उस रात किसान अपने खेत में ही रुक गया आधी रात बीत जाने पर भी कोई नहीं आया  और कुछ समय बाद   किसान भी सो गया पर फिर से ऐरावत आया फिर उसी गरीब किसान के हरे भरे धान के खेत का 1/4 हिस्सा खा गया और अब की बार किसान सोता ही रहा गया। अगले दिन जब वो उठा तो फिर अपना उजड़ा हुआ खेत देख कर निराश हो गया पर फिर उसने सोचा की "अब मेरे खेत का केवल 1/4 हिस्सा ही बचा है बाकि 3/4 ख़त्म हो गया अब मेरे पास आखरी मौका है चोर को पकड़ने के लिए" ये सोच कर उसने अपनी एक ऊँगली काट लेता है और नमक मिर्च लेकर रात में बैठ जाता है  घाव पर नमक मिर्च लगने से उसकी नींद उड़ जाती है और वो चोर की प्रतीक्षा करने लगता है।

तब आधी रात के बाद फिर ऐरावत आया इस बार किसान तैयार था। ऐरावत उड़ते हुए खेत में आया और बचा हुआ धान खाने लगा। मौका पाकर किसान ऐरावत के पास पहुँच गया। जब ऐरावत थोड़ा धान खा कर वापस इन्द्रलोक जाने लगा तो किसान ने ऐरावत हाथी की पुंछ पकड़ ली और हाथी की पुंछ पकडे हुए वो इन्द्रलोक जा पहुंचा। इन्द्रलोक की भव्यता और भवन देख कर बहुत खुश हुआ। भव्यता को निहारते हुए इन्द्र देव के सैनिको ने उसको घुसपैठिया समझ पकड़ा लिया और देवताओ के राजा इंद्र के सामने ले गए। राजा इंद्र ने उसको अपने बचाव में सफाई देने को कहा तब किसान ने अपनी आप बीती राजा इंद्र को सुनाई की कैसे उनके ऐरावत हाथी ने उसके खेत को और  उसकी फसल को बर्बाद किया और राजा इंद्र से न्याय की मांग की ।

इंद्रदेव ने सच्चाई का पता लगाने के लिए ऐरावत हाथी को बुलाया और ऐरावत हाथी ने अपनी गलती स्वीकार भी कर ली। अब राजा इंद्र के मंत्रियो ने कहा की "महाराज गलती हमारी और से हुई है तो उस गरीब किसान के नुकसान की भरपाई करना हमारी जिम्मेदारी है।" तब इंद्रदेव ने किसान को नुकसान की भरपाई के लिए 1 बड़ा घड़ा भर कर स्वर्ण मुद्रा कीमती मोती और जवाहरात दिए और उसको सकुशल उसके गाँव भेज दिया।

गरीब किसान ख़ुशी ख़ुशी घर आया और अपनी पत्नी को पूरी बात बताई कैसे वो धनवान हो गए। दिन होते ही किसान ने अपनी पत्नी से कहा की जाकर पड़ोस की चौधराईन से तराजू ले आ ताकि इंद्र की दी हुई मोहरे तौल सके। किसान की पत्नी पड़ोस की चौधराईन से तराजू मांगने चली गयी

किसान की पत्नी सीधी साधी भोली भाली थी पर चौधराईन बहुत तेज और चालाक, चौधराईन को किसान की पत्नी पर शक हो गया क्योकि उसको मालूम था की किसान की आर्थिक दशा अच्छे नहीं है और उसकी फसल बर्बाद हो गयी है तो चौधराईन ने सच पता लगाने तराजू के निचले हिस्से में गौंद लगा दिया ताकि जो कुछ भी उस पर तौला जाये वो उस पर चिपक जाये और हुआ भी यही किसान की एक सोने की मुहर तराजू के निचले हिस्से पर रह गयी जहाँ उसकी नज़र नहीं पड़ी और जब तराजू चौधराईन के हाथ आई तो उसने अपने पति को ये बात बता दी की उस गरीब किसान के पास खूब सारा सोना है।


चौधरी गांव के लोगो को लेकर किसान के घर आ गया और उसको पकड़ लिया। चौधरी ने किसान से पूछा "बता इतना सोना कहाँ से लाया ?? कहाँ से चुराया ?? किसका है ये सोना??" और किसान ने डर के कारण सब सच सच गांव वालो को बता दिया। तब सभी गाँव वालो ने फैसला किया की वो सभी रात में उस हाथी की प्रतीक्षा करेंगे।

अगली रात फिर वही सब दोहराया गया तब आधी रात के बाद फिर ऐरावत आया इस बार पूरा गांंव तैयार था। ऐरावत जब बची कूची धान खाने लगा तो वही किसान ने फिर से ऐरावत की पुंछ पकड़ ली और फिर ऐरावत भी स्वर्ग के लिए उड़ने लगा ये देख कर चौधरी ने किसान के पैर पकड़ लिए और वो भी उड़ने लगा ये देख तीसरे किसान ने चौधरी को पकड़ लिया और देखते ही देखते पूरा गाँव ऐरावत की पुंछ के सहारे उड़ने लगा।

पर सभी गाँव वालो को बहुत उत्सुकता थी की आखिर उनको कितना सोना मिलेगा तभी सबसे आखिर में लटके किसान ने लालच में आकर गरीब किसान से से पूछा की "क्यों भईया इंद्रदेव का घड़ा कितना बड़ा था" और उत्साही गरीब किसान ने हाथो के इशारे से घड़े का नाप बता दिया। पर इस कारन उसका हाथ से हाथी की पुंछ छूट गयी और इस कारण उसके सराहे लटके हुए गाँव के सारे किसान एक साथ जमीन पर आ गिरे। किसी का हाँथ टुटा तो किसी का पैर और सोने से भरा घड़ा भी हाथ से गया।

इसलिए कहते है भाई लालच बुरी बला है और सब्र का फल मीठा होता है




My View
ये कहानी मैने अपने बचपन में मेरी आई (माँ) से सुनी थी। और ये ब्लॉग मेरी आई श्रीमती वनमाला माधव करंदीकर को समर्पित है। मै जानता हूँ इसको में उतना अच्छा नहीं लिख पाया जितना मेरी आई के मुह से सुनता था। इसके लिए क्षमा करें ।

कुपोषण, खाद्यान्न की बर्बादी और क्रूर उदासीनता

भारत वैश्विक खाद्यान उत्पादन में दूसरे नंबर पर आता है पर भारत के कई राज्य के लोग भूख से पीड़ित हैं। जिनकी संख्या अफ़्रीकी देश इथियोपिया या सूडान की जनसँख्या से भी अधिक हैं। भारतीय बच्चों में से 60 प्रतिशत कुपोषित होते हैं। जबकि दूसरी और देश में खाद्यान्नों का कुल उत्पादन में बहुत अच्छी वृद्धि हुई है। 1951-52 में देश में खाद्यान्नों का कुल उत्पादन 5.09 करोड़ टन था। जो क्रमशः बढ़कर 2008-2009 में बढ़कर 23.38 करोड़ टन हो गया। जो 2013 में 25.9 करोड़ टन पहुँच गया इसी तरह प्रति हेक्टेअर उत्पादकता में भी पर्याप्त सुधार हुआ है। वर्ष 1950-51 में खाद्यान्नों का उत्पादन 522 किग्रा प्रति हेक्टेअर था, जो बढ़कर 2008-2009 में 1,893 किग्रा प्रति हेक्टेअर हो गया। अर्थात भारत में संसाधनो की कोई कमी नहीं है पर उसका सही उपयोग हम नहीं कर पाते और उसका योग्य उपयोग करना सभी का दायित्व है















      

हम में से अधिकतर ये सोचते है की जनता तक अन्न पहुँचना केवल सरकार का दायित्व है हाँ वैसे ये सही बात है की शासन व्यवस्था ही इस काम को देखती है।  पर देश में कई टन अनाज ख़राब हो जाता है और कई टन उपयोग नहीं होने के कारन फेंक दिया जाता है। पर इस अन्न की बर्बादी के पीछे केवल सरकार की व्यवस्था की नाकामी है। ये कहना गलत होगा


जिस देश में अन्न को ईश्वर माना जाता है वहाँ अन्न की बर्बादी बेहद शर्मनाक है। शुभ अवसरों पर होने वाले भोज अब अन्न की बर्बादी के जिम्मेदार हम ही है। कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय (यूएएस), बंगलौर के एक सर्वे के अनुसार बैंगलोर जैसे शहर में समारोह के दौरान 943 टन पौष्टिक भोजन फेंक कर बर्बाद कर दिया जाता है। जो यह 2.6 करोड़ लोगों को एक समय भोजन खिलाने के लिए पर्याप्त है। 

इस तरह की बर्बादी के लिए हम लोग भी दोषी है जो समारोह के दौरान थालियों में खूब सारा भोजन तो रख लेते है पर उसको ग्रहण नहीं करते और वो आगे जाकर किसी काम नहीं आता। एक अन्य सर्वे में उत्तरदाताओं ने कहा लगभग 75 प्रतिशत भोजन का अपव्यय बुफे सिस्टम (एक पश्चिमी पद्धति है) के कारण अधिक होता है। विश्व खाद्य संगठन  के अनुसार भारत में हर साल 50000 करोड़ रूपये का भोजन बर्बाद हो जाता है, यूएनडीपी के अनुसार - संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम,  40% भोजन भारत में बर्बाद किया है
यदि यही हाल रहा तो देश का किसान कितनी भी मेहनत कर ले कोई भी देश के भूखे लोगो का पेट नहीं भर सकता।  ये केवल सरकार का नहीं देश के सभी नागरिको का कर्तव्य है की भोजन की कीमत को समझे उसको बर्बाद करने से पहले 100 बार सोंचे की देश की एक बड़ी आबादी भूखे पेट सो रही है।