कुपोषण, खाद्यान्न की बर्बादी और क्रूर उदासीनता

भारत वैश्विक खाद्यान उत्पादन में दूसरे नंबर पर आता है पर भारत के कई राज्य के लोग भूख से पीड़ित हैं। जिनकी संख्या अफ़्रीकी देश इथियोपिया या सूडान की जनसँख्या से भी अधिक हैं। भारतीय बच्चों में से 60 प्रतिशत कुपोषित होते हैं। जबकि दूसरी और देश में खाद्यान्नों का कुल उत्पादन में बहुत अच्छी वृद्धि हुई है। 1951-52 में देश में खाद्यान्नों का कुल उत्पादन 5.09 करोड़ टन था। जो क्रमशः बढ़कर 2008-2009 में बढ़कर 23.38 करोड़ टन हो गया। जो 2013 में 25.9 करोड़ टन पहुँच गया इसी तरह प्रति हेक्टेअर उत्पादकता में भी पर्याप्त सुधार हुआ है। वर्ष 1950-51 में खाद्यान्नों का उत्पादन 522 किग्रा प्रति हेक्टेअर था, जो बढ़कर 2008-2009 में 1,893 किग्रा प्रति हेक्टेअर हो गया। अर्थात भारत में संसाधनो की कोई कमी नहीं है पर उसका सही उपयोग हम नहीं कर पाते और उसका योग्य उपयोग करना सभी का दायित्व है















      

हम में से अधिकतर ये सोचते है की जनता तक अन्न पहुँचना केवल सरकार का दायित्व है हाँ वैसे ये सही बात है की शासन व्यवस्था ही इस काम को देखती है।  पर देश में कई टन अनाज ख़राब हो जाता है और कई टन उपयोग नहीं होने के कारन फेंक दिया जाता है। पर इस अन्न की बर्बादी के पीछे केवल सरकार की व्यवस्था की नाकामी है। ये कहना गलत होगा


जिस देश में अन्न को ईश्वर माना जाता है वहाँ अन्न की बर्बादी बेहद शर्मनाक है। शुभ अवसरों पर होने वाले भोज अब अन्न की बर्बादी के जिम्मेदार हम ही है। कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय (यूएएस), बंगलौर के एक सर्वे के अनुसार बैंगलोर जैसे शहर में समारोह के दौरान 943 टन पौष्टिक भोजन फेंक कर बर्बाद कर दिया जाता है। जो यह 2.6 करोड़ लोगों को एक समय भोजन खिलाने के लिए पर्याप्त है। 

इस तरह की बर्बादी के लिए हम लोग भी दोषी है जो समारोह के दौरान थालियों में खूब सारा भोजन तो रख लेते है पर उसको ग्रहण नहीं करते और वो आगे जाकर किसी काम नहीं आता। एक अन्य सर्वे में उत्तरदाताओं ने कहा लगभग 75 प्रतिशत भोजन का अपव्यय बुफे सिस्टम (एक पश्चिमी पद्धति है) के कारण अधिक होता है। विश्व खाद्य संगठन  के अनुसार भारत में हर साल 50000 करोड़ रूपये का भोजन बर्बाद हो जाता है, यूएनडीपी के अनुसार - संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम,  40% भोजन भारत में बर्बाद किया है
यदि यही हाल रहा तो देश का किसान कितनी भी मेहनत कर ले कोई भी देश के भूखे लोगो का पेट नहीं भर सकता।  ये केवल सरकार का नहीं देश के सभी नागरिको का कर्तव्य है की भोजन की कीमत को समझे उसको बर्बाद करने से पहले 100 बार सोंचे की देश की एक बड़ी आबादी भूखे पेट सो रही है।